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कोरोना से परेशान इस देश मे शायद काॅमेडियनों का वक्त भी खराब चल रहा है। एक के बाद एक काॅमेडियनों पर मामले दर्ज हो रहे हैं और काॅमेडियन हैं कि ‘सुधरने’ का नाम नहीं ले रहे। ऐसा लगता है कि अब उन्हें भी ‘बुद्धिजीवियों’ की पांत में रखा जाने लगा है। वरना आठवीं पास काॅमेडियन श्याम रंगीला के ताजा काॅमेडी  वीडियो में ‘पेट्रोल को उसका वाजिब हक दिलाने’ के तंज के अलावा ऐसा कुछ नहीं है कि सम्बन्धित तेल कंपनी उसे उस पेट्रोल पम्प मालिक के जरिए धमकाने लगे। श्याम की गलती ( अगर है तो)  यही कि उसने पेट्रोल के साथ डीजल को भी 100 रू. लीटर तक पहुंचाने का वादा किया और कहा कि देशहित में हमे इसे सहन करना चाहिए। यह बात भी उसने प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की भाषण शैली की नकल करते हुए कही। 
लेकिन सवाल यह है कि श्याम की इतनी हिम्मत कैसे हुई कि वह पेट्रोल-डीजल के भावों को लेकर इस तरह कटाक्ष करे कि जिससे राष्ट्र की छवि खराब हो। उसे समझना चाहिए कि ये भाव भी देशहित में ही बढ़ाए जा रहे हैं और जरूरी हुआ तो बढ़ाए जाते रहेंगे। क्योंकि देशहित सर्वोपरि है और पेट्रोल के चढ़ते भाव उसके आगे कुछ भी नहीं है। लोग चाहें तो पेट्रोल-डीजल से गाडि़यां चलाना बंद कर दें या फिर किसान डीजल पंपों पर ताला डाल दें। इससे किसी को कोई फर्क नहीं पड़ने वाला है। देश आगे बढ़ता रहेगा। लेकिन श्याम रंगीला जैसे लोग इसका मजाक बनाने का दुस्साहस करेंगे तो तेल कंपनी तो क्या कोई अदना सा पेट्रोल पंप वाला भी इसे सहन नहीं करेगा। गौरतलब है कि श्याम के इस वीडियो को साढ़े आठ लाख व्यूज  मिल चुके हैं। दो मिनट 15 सेकंड के इस वीडियो का अंत इस वाक्य के साथ होता है- ‘हमारा क्या हम तो चल देंगे’, कहकर श्याम अपनी साइकिल उठाकर चल देता है। वैसे श्याम रंगीला को ऐसी मिमिक्री टाइप काॅमेडी के लिए पहले भी झटके लग चुके हैं। इंडियन लाॅफ्टर चैलेंज में श्याम ने प्रधानमंत्री मोदी और कांग्रेस नेता राहुल गांधी की सटीक‍ मिमिक्री की थी, लेकिन आयोजको ने किसी कारण से दोनो ही वीडियो रिजेक्ट कर दिए थे। लेकिन श्याम ने अपना काम जारी रखा। 24 वर्षीय श्याम में किसी की भी मिमिक्री करने की अद्भुत क्षमता है। अपने ताजा वीडियो पर मिल रही धम्कियों के बाद श्याम ने एक बयान में कहा कि ‘पता नहीं लोगों की कैसी-कैसी भावनाएँ हैं और कैसी-कैसी छवि है, इस वीडियो से कैसी-कैसी छवि को ठेस पहुँच जाती है। मुझे तो पता भी नहीं चलता।’ श्याम एक जगह पूछता है-‘‘मेरे को अजीब लगा। मैंने ग़लत क्या कहा था ? मैंने किसी भी धर्म के ख़िलाफ़ टिप्पणी नहीं की, किसी भी धर्म-समुदाय पर जोक नहीं बनाया है। ऐसे जोक बनाता हूँ, ऐसी कॉमेडी करता हूँ कि लोगों को हंसी आए और दो-चार दिन में वायरल होकर बात ख़त्म हो जाए।'
लेकिन भले आदमी ऐसी काॅमेडी दो-चार दिन में खत्म नहीं होती। पेट्रोल भले ही खुले में रहने से हवा में उड़ जाए, लेकिन काॅमेडी के कांटे गहरे धंसते जाते हैं, जो निकलते भी हैं तो किसी जेल खाने में। श्याम ही क्या, दूसरे स्टैंड अप काॅमेडियनों को भी समझना चाहिए कि ‍निर्मल हंसी हंसने या हंसाने का वक्त नहीं रहा। जीवन के तनाव बहुआयामी हो चुके हैं। व्यवस्था की आंखें पहले से ज्यादा चौकन्नी हैं। श्याम को डर है कि उसके खिलाफ भी मानहानि का मुकदमा दर्ज किया जा सकता है। लेकिन श्याम को मालूम होना चाहिए कि आजकल भावनाएं इतनी ज्यादा ‘नाजुक’ हो गई हैं कि भावनाअों को खुद अपने पर भरोसा नहीं रहा। वो निकलती किसी जज्बे के साथ हैं और लगती किसी दूसरे जज्बे के साथ। 
उल्लेखनीय है कि श्याम प्रकरण के दो हफ्ते पहले ही एक और काॅमेडियन मुनव्वर फारूकी को बड़ी मुश्किल से देश की सबसे बड़ी अदालत से अंतरिम जमानत ‍िमली थी। वो भी इस बात बिना पर कि जिस आरोप में मुनव्वर को गिरफ्ताइर किया गया था, उसके ठोस सबूत पुलिस अदालत में नहीं दे पाई थी। हालांकि यह मामला अभी खत्म नहीं हुआ है। क्योंकि भावनाअो पर लगी ठेस का कोई अंत या कानूनी अंजाम नहीं होता। ठेस, ठेस है। कब हरी हो जाए, कोई नहीं जानता। 
इसी तरह काॅमेडियन कुणाल कामरा की सजा अभी तक तय नहीं हो पाई है। उन पर आरोप है कि उन्होंने अपनी काॅमेडी से देश की सबसे बड़ी अदालत की मानहानि की है। मानहानि हुई है या नहीं या कितनी हुई है, यह भी अदालत को ही तय करना है। लेकिन मामला जल्द खत्म होगा, ऐसा नहीं लगता। वैसे कुणाल कामरा पर खुला आरोप है कि उनका रूझान वामपंथी है और वामपंथी को तो भूलकर भी काॅमेडी के चक्कर में नहीं पड़ना चाहिए। कुणाल ने वह की और उन्हें अपनी इस ‘भयंकर भूल’ पर कोई अफसोस भी नहीं है। 
लेकिन श्याम का मामला तो तीनो से अलग इसलिए है, क्योंकि न तो वह ‘अल्पसंख्यक काॅमेडियन’ है और न ही ‘वामपंथी काॅमेडियन’ है। उसे ‘बुद्धिनजीवी काॅमेडियन’ मानना भी मुश्किल है, क्योंकि वह आठवीं तक ही पढ़ा है।  शक्लो-सूरत से भी वह ‘आम आदमी टाइप काॅमेडियन’ ज्यादा लगता है, जो चाय की गुमठी, टपरे या चौराहे पर अपनी बात बेधड़क अंदाज में कह जाता है। जिसे दीवारों में सीसीटीवी कैमरों सी जड़ी आंखों का भी डर नहीं लगता। शायद श्याम को भी मिमिक्री के राजनीतिक खतरों का ठीक से अंदाजा नहीं है। लिहाजा बाकी दोनो काॅमेडियनों की तर्ज पर श्याम ने भी यही कहा कि वह उसके वीडियो के कारण पेट्रोल पंप मालिक को हुई परेशानी के लिए तो माफी मांग सकता है, लेकिन वीडियो के कंटेंट के लिए कदापि क्षमा याचना नहीं करेगा। 
अब सवाल यह है कि इन काॅमेडियनों में ऐसी  हिम्मत आती कहां से है? भीतर से या किसी के इशारे पर ? काॅमेडी के जरिए वो राष्ट्र को बचाने में लगे हैं या बर्बाद करने में? वरना काॅमेडी ही करना है तो देश में बहुत से विषय हैं, जिनकी रेंज पत्नी, साली और प्रेमिका से लेकर दवा-दारू, मोटापा, गंवईपन, विपक्षी राजनीतिक पार्टियां तथा फैशन से लेकर पाकिस्तान तक फैली है। इन पर काॅमेडी करें, जी भर करें। लोगों से ज्यादा खुद हंसें। हास्य कवि सम्मेलनों का बूस्टर तो यही विषय हैं। लेकिन ईंधन का प्रतीक पेट्रोल-डीजल के दाम बढ़ने पर काॅमेडी करना भी कोई काॅमेडी है? वो भी किसी नेता की मिमिक्री के अंदाज में? ना भई ना। काॅमेडियनों को याद रखना चाहिए कि पेट्रोल-डीजल जलने पर केवल धुंआ निकलता है। हंसी नहीं ! और फिर किसी सरकार का संकल्प या मजबूरियां काॅमेडी का विषय कैसे हो सकते हैं? कोई ज्ञानात्मक संबोधन मिमिक्री का मुद्दा कैसे हो सकता है? ये बात इन नासमझ काॅमेडियनों की समझ में कब आएगी? 
बहरहाल इन ‘काॅमेडीजन्य अपराधों’ की श्रृंखला से लगता है कि इन तमाम काॅमेडियनो ने अपनी मर्यादाअोंको लांघकर मानो व्यवस्था के खिलाफ कोई नई ‘काॅमिक क्रांति’ तो नहीं छेड़ दी है? उपलब्धियों पर ‘गर्व’ करने की बजाए ‘गर्क’ वाली भाषा में काॅमेडी कर ये देश को गुमराह करने में क्यों लगे हैं? कहीं इनको मुगलता तो नहीं हो गया कि इतना सब करने के बाद भी इनके मुंह खुले रह सकेंगे और लोग इनकी ‘स्टैंड अप काॅमेडी’ को ‘काॅमेडी’ मानकर स्टैंडिंग अोवेशन देते रहेंगे ? आज पेट्रोल सौ रू. लीटर हो गया तो मिमिक्री वीडियो बना डाला। दो सौ रू. लीटर होगा तब क्या करेंगे? 

-लेखक‘सुबह सवेरे’ के वरिष्ठ सम्पादक है।

न्यूज़ सोर्स : अजय बोकिल जी भोपाल